Sunday, October 25, 2026
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हरेला पर्व बना पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत का संदेशवाहक

रिपोर्टर: ललित जोशी

उत्तराखंड में मनाया जाने वाला हरेला पर्व इस वर्ष भी पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। नैनीताल सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने हरेला बोया, पूजा-अर्चना की और पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। यह पर्व प्रकृति, कृषि और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने बताया कि हरेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। उन्होंने कहा कि हरियाली मानव जीवन का आधार है और हरेला हमें पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है।

उन्होंने बताया कि हरेला के दौरान मिट्टी में विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं, जो कुछ दिनों बाद हरियाली के रूप में तैयार होते हैं। इन्हें कुलदेवता को अर्पित करने के बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों के सिर पर रखकर सुख, समृद्धि और लंबी आयु का आशीर्वाद देते हैं।

डॉ. तिवारी के अनुसार वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए हरेला का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। पौधारोपण और हरियाली बढ़ाने का संदेश इस पर्व को सामाजिक अभियान का स्वरूप देता है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि हरेला केवल एक दिन का उत्सव न होकर वर्षभर पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा बने। प्रत्येक व्यक्ति यदि एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण मिल सकता है।

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