रिपोर्टर: धर्मेंद्र सिंह
उत्तराखंड का क्षेत्रीय फिल्म उद्योग लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहा है। राज्य में पिछले एक दशक से फिल्म बोर्ड का गठन न होने के कारण फिल्म निर्माण, कलाकारों और सांस्कृतिक गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा है। इस मुद्दे को लेकर उत्तराखंड फिल्म टेलीविजन एंड रेडियो एसोसिएशन (उफतारा) ने मसूरी में प्रेस वार्ता कर अपनी नाराजगी जाहिर की और सरकार से तुरंत कार्रवाई की मांग की।
10 साल से लंबित फिल्म बोर्ड, उद्योग पर पड़ा असर
उफतारा के अध्यक्ष प्रदीप भंडारी ने कहा कि फिल्म बोर्ड के अभाव में राज्य का फिल्म उद्योग ठहर सा गया है। उन्होंने बताया कि फिल्म पुरस्कारों के लिए निर्धारित 50 लाख रुपये से अधिक की राशि भी वर्षों से अटकी हुई है, जिससे कलाकारों का मनोबल टूट रहा है।
स्थानीय फिल्म निर्माताओं को आर्थिक झटका
प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद द्वारा दिए जाने वाले अनुदान में 25% से ज्यादा कटौती की जा रही है। इससे छोटे और मध्यम स्तर के फिल्म निर्माताओं के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है।
स्थानीय कलाकारों की अनदेखी पर उठे सवाल
प्रेस वार्ता में यह भी सामने आया कि सरकार बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता दे रही है, जबकि उत्तराखंड के कलाकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे। उफतारा का कहना है कि इससे राज्य की प्रतिभाएं हाशिए पर चली गई हैं और स्थानीय संस्कृति को भी नुकसान हो रहा है।
लोक संस्कृति और वाद्य यंत्रों के संरक्षण की मांग
संस्था ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोक कला के संरक्षण को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई, जिससे यह धरोहर धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
आंदोलन की चेतावनी
उफतारा ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार जल्द ही फिल्म बोर्ड का गठन नहीं करती और समस्याओं का समाधान नहीं होता, तो संगठन बड़े स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होगा।
नीति बनी, लेकिन जमीनी फायदा नहीं—महासचिव
उफतारा के महासचिव कांता प्रसाद ने कहा कि राज्य सरकार ने फिल्म नीति तो तैयार की है, लेकिन उसका फायदा क्षेत्रीय फिल्म उद्योग तक नहीं पहुंच रहा। उन्होंने चिंता जताई कि आंचलिक भाषाओं का सिनेमा लगातार घट रहा है और सिनेमा हॉल में दर्शकों की संख्या भी बेहद कम रह गई है।
फिल्म उद्योग: रोजगार और संस्कृति का आधार
उफतारा के मुताबिक, फिल्म उद्योग राज्य के युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा माध्यम हो सकता है और साथ ही यह भाषा और संस्कृति को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में सरकार को इस क्षेत्र में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड की खूबसूरत लोकेशन और समृद्ध संस्कृति फिल्म उद्योग के लिए अपार संभावनाएं रखती हैं, लेकिन योजनाओं के अभाव और लापरवाही के चलते यह क्षेत्र पिछड़ता जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस दिशा में कितनी गंभीरता से कदम उठाती है।


