खटीमा में वन विभाग पर गंभीर आरोप: थारू जनजाति का शोषण, तस्करों को संरक्षण?

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रिपोर्टर: सुभाष चंद

खटीमा में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र खटीमा में वन विभाग की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर सरकार जनजातीय समाज के उत्थान की बात करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय थारू जनजाति के लोगों ने वन विभाग के कर्मचारियों पर शोषण और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग के कुछ कर्मचारी और अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। हालात इतने खराब बताए जा रहे हैं कि दाह संस्कार जैसे जरूरी कार्य के लिए सूखी लकड़ी लेने पर भी लोगों से पैसे वसूले जा रहे हैं।


गरीब ग्रामीणों पर कार्रवाई, तस्करों को संरक्षण?

स्थानीय लोगों के अनुसार, साइकिल पर सूखी लकड़ी लाकर जीवनयापन करने वाले गरीब ग्रामीणों को प्रताड़ित किया जा रहा है। उन पर झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे उनका जीवन और मुश्किल हो गया है।

वहीं, आरोप यह भी है कि बड़े स्तर पर लकड़ी तस्करी करने वाले बाहरी लोगों को वन विभाग का संरक्षण मिल रहा है। कुछ वन अधिकारी कथित तौर पर चौकियों से अनुपस्थित रहते हैं और पर्दे के पीछे से तस्करी को बढ़ावा देते हैं।


मारपीट की घटना ने बढ़ाया आक्रोश

हाल ही में विपिन सिंह राणा के साथ हुई मारपीट की घटना ने ग्रामीणों के गुस्से को और भड़का दिया है। इस घटना को वन विभाग की संवेदनहीनता का उदाहरण बताया जा रहा है। पीड़ित परिवार और स्थानीय समाज दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग कर रहा है।


ग्रामीणों की मुख्य मांगें

  • मारपीट के आरोपियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो
  • थारू जनजाति के साथ हो रहे दुर्व्यवहार पर रोक लगे
  • वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की उच्च स्तरीय जांच हो
  • झूठे मामलों में फंसाए गए निर्दोष लोगों को न्याय मिले

आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि वन विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ और तस्करों पर सख्ती नहीं की गई, तो जनजातीय समाज उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होगा।

इस बीच, एसडीओ संचिता वर्मा की अनुपस्थिति में खटीमा के वन क्षेत्र अधिकारी मीडिया के सवालों से बचते नजर आए। अब देखना होगा कि प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या कदम उठाता है।

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