वंदे मातरम् के 150 वर्ष: नैनीताल में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर भव्य सेमिनार आयोजित

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रिपोर्ट: ललित जोशी

सरोवर नगरी नैनीताल में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक भव्य सेमिनार का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सीआरएसटी इंटर कॉलेज के सभागार में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, नैनीताल द्वारा “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सामूहिक गायन से हुई। स्कूली बच्चों और उपस्थित जनसमूह ने हारमोनियम और तबले की संगत में इसे प्रस्तुत किया, जिसे सभी ने खूब सराहा। आजकल अधिकांश स्कूलों में वंदे मातरम् का नियमित गायन अनिवार्य किया गया है, जिससे देशभक्ति की भावना को बढ़ावा मिल रहा है।

मुख्य अतिथि राजेश ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की आज़ादी में वंदे मातरम् का योगदान अद्वितीय रहा है और यह आज भी देशभक्ति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही डॉ. रेखा त्रिवेदी ने कहा कि यह गीत राष्ट्र को समर्पित है और युवाओं को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।

विशिष्ट अतिथि डॉ. पुष्पलता जोशी ने राष्ट्र को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि वंदे मातरम् हमारे जोश और शक्ति का प्रतीक है। वहीं सौरभ पांडे ने कहा कि “जननी जन्मभूमि” के प्रति सम्मान ही देशभक्ति की असली पहचान है।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार प्रोफेसर गिरीश रंजन तिवारी ने कहा,
“जब हम स्वयं को समझते हैं, तभी हम राष्ट्र के लिए सार्थक कार्य कर पाते हैं।”

प्रोफेसर ललित तिवारी ने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हुए कहा कि उनके त्याग और कर्मों की वजह से ही आज हम आज़ादी का आनंद ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी पहचान है।

डॉ. माधव प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश के लिए बलिदान देने वालों ने वंदे मातरम् को प्रेरणा का स्रोत बनाया।
डॉ. जगदीश पंत ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत बनने के लिए हमें इस गीत की भावना को अपने जीवन में उतारना होगा।

आशा खाती ने वंदे मातरम् को राष्ट्र का गौरव, पहचान और भारतीयता का प्रतीक बताया।

कार्यक्रम का संचालन बसंती रौतेला ने किया। दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ और सभी वक्ताओं को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।

वंदे मातरम् का इतिहास

वंदे मातरम् की रचना 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह 1882 में उनके उपन्यास आनंद मठ में शामिल हुआ। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया और 1950 में इसे भारत के राष्ट्रगीत का दर्जा मिला।

कार्यक्रम में सीआरएसटी इंटर कॉलेज और बालिका विद्यामंदिर के विद्यार्थियों ने शानदार प्रस्तुतियां दीं। अंत में सामूहिक वंदे मातरम् गाकर कार्यक्रम का समापन हुआ।

इस अवसर पर प्रधानाचार्य मनोज पांडे, शबनम, विनीता पाठक, विमलेश गोस्वामी, नीलम जोशी, बिसना साह, भावना कांडपाल, मुन्नी तिवारी, अंजू बिष्ट, रेनू बिष्ट सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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