मसूरी: उत्तराखंड की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसी मसूरी में प्रसिद्ध पर्यावरणविद और शिकारी जिम कॉर्बेट की 151वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में इतिहासकार गोपाल भारद्वाज और वरिष्ठ पत्रकार बिजेंद्र पुंडीर ने जिम कॉर्बेट के जीवन से जुड़े कई ऐसे पहलुओं पर रोशनी डाली, जिनसे आम लोग आज भी अनजान हैं।
गोपाल भारद्वाज ने बताया कि दुनिया जिम कॉर्बेट को एक खतरनाक आदमखोर बाघों के शिकारी के रूप में याद करती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे अपने समय के बेहतरीन वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर भी थे। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने शिकार छोड़ दिया था और जंगलों के संरक्षण के लिए अपना कैमरा ही अपना हथियार बना लिया था।
संगोष्ठी के दौरान भारद्वाज ने कॉर्बेट द्वारा खींची गई कुछ दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीरों और उनके मसूरी प्रवास से जुड़े प्रसंगों को श्रोताओं के सामने रखा। उन्होंने बताया कि उस जमाने में बिना किसी डिजिटल तकनीक के जंगल के हिंसक जानवरों की करीब से फोटो खींचना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था, जिसे कॉर्बेट ने बड़ी सहजता से किया।
वरिष्ठ पत्रकार बिजेंद्र पुंडीर ने कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि जिम कॉर्बेट की दृष्टि केवल बाघों तक सीमित नहीं थी। वे हिमालय की वादियों, स्थानीय ग्रामीणों की संस्कृति और जंगलों की जैव विविधता को भी अपने कैमरों और किताबों में संजोते थे। उनका मसूरी से एक अटूट नाता था, जहाँ वे अक्सर विश्राम और अपने लेखन कार्य के लिए आते थे।
समारोह के अंत में वक्ताओं ने वर्तमान पीढ़ी से जिम कॉर्बेट के पदचिह्नों पर चलने की अपील की। उन्होंने कहा कि आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और वनों के विनाश की चुनौती से जूझ रही है, ऐसे में जिम कॉर्बेट की शिक्षाएं और प्रकृति प्रेम और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।



